Vill- Jhakuapara, P.O.- Bhurargarh, P.S.- Sipajhar, Dist.- Darrang (Assam), Pin- 784147, India
भुरारगढ़
भुरारगढ़
गाँव- झकोअपरा, डाक- भुरारगढ़, थाना- छिपाझार, जिल्ला- दर्रांग (असम), पिन- ७८४१४७, भारत
परिचिति (Introduction) :
इतिहास (History) :
वर्त्तमान स्थिति (At present) :
समाप्त (End) :
परिचिति (Introduction) :
दर्रांग जिल्ला के एक प्राचीन गौरव भुरारगढ़ मंगलदाई सहर के उत्तर-पछिम कोनेमें लग भाग 20-25 किलोमीटर की दुरी में ये गढ़ स्थित हे। इस गढ़का निर्माण काल लग भाग 1500 शतीका हे। मिटटी से बना ये गढ़ प्रचार की सभी तरफ से अंधकार में रहा। अब इस गढ़ का लग भाग 90 प्रतिशद धंस करदीया गया हे। फिरभी पूरब और उत्तर-पश्चिम कोने की दिशा में पूरब गढ़ का कुछ अंश अतीत स्मृति राख्या करते हुए अपने गरिमा के साथ खरे हुए हे। पहले इस गढ़ की उसाई 20 -25 फुट तक था। इस गढ़ के अंदर पूरा 450 बीघा जमीन हे। पूर्ब गढ़ के तीन दिशा में तीन मिट्टीसे बनाया गया प्रबेश द्वार था। इन द्वार का निर्माण सैली अद्भुद था। वहा द्वारपाल रहने के साथ साथ एक बिसेष तरह से आने जाने का ब्याबस्था रखा हुआ था। जिसको यहाँ के स्थानीय लोगोके बीज बुरुज नामसे जाना जाता हे। इसी एक बुरुज में देउल उत्शव भी मनाया जाता हे। लेकिन समय के साथ साथ ये सब तरदिया गया हे। उत्तर दिशा के पूरी गढ़ के ऊपर रास्ता बन गया हे। दक्षिण-पछिम दिशामे गढ़ के बहुत सारा अवसिस्त अंस आजभी अछि तरह और स्पष्ट रूपमे देखा जाता हे।
इतिहास (History) :
मंगलदाई बुरंजी (Mangladai History) दर्रांग जिल्ला के सबसे पुराणी इतिहास हे। इसे दिनेश्वर शर्माजी ने उन स्थानों में खोद जा जा कर इसे लिखा हे। शर्माजी ने इस गढ़ के बारे में कुछ इसतरह लिखा हे - दर्रांग जिल्लाके कलैगांव तहसील के अंदर सरांधारा गांव में ४०१/१४ लेसा जमीन में लग भाग २०-२५ फुट उषा भुरारगढ़ नाम का एक बिशाल गढ़ हे। सैकोरो सालके बाद भी ये गढ़ इतन उषा हे तो जब इसे बनाया गया तब ये कितना उषा था इसका अनुमान लगाया जा सकता हे। असम राज्य के उस समय के गवर्नर (राज्यपाल) जोइरामदास दौलतराम असम भ्रमण के दौरान मंगलदाई के इस गढ़के बड़े में काफी अनुसन्धान किया था। गढ़ निर्माण किया जाता हे स्वभाबिक रूपसे अपने राजधानी सुरक्षा के लिए और युद्धके समय में दुसमन से अपनी सेनाओको रक्षा करने के लिए या तो दुश्मनोको आक्रमण करने के लिए। ये गढ़ मिट्टीके द्वारा बनाया गया। किउकी उस समय में मिट्टीसे ही सभी गढ़ तैयार किया जाता था। गढ़ के अंदर ४-५ हवेली का बुनियाद सोता सोता दो तालाब हे। गढ़के सन्मुख भाग जिस तरफ था उस तरफ प्रबेश पथ के दोनों तरफ द्वारपाल रहने का जगह बिसेस तरह रूप से निर्माण किया था। वर्त्तमान यहां की गाँव के लोगोने इस स्थान को बुरुज बोलते हे। बुरुज सब्द को कोठ के कर्य में इस्तेमाल किया हुआ एक सब्द हे। कोठ युद्ध की कार्य में इस्तेमाल किया हुआ एक स्थान हे। इस से निश्चित रूप से कहा जा सकता हे की ये गढ़ उस समय के जो श्रेष्ठ हे बो युद्ध करने केलिये निर्माण किया था।
शर्माजी ने और लिखा हे - गढ़ के सामने सरांधारा गाँव के बिभूति मंडल नाम का एक ज्ञानी लोगोने कहा था की, एक समय में दर्रांग राज्य के ४० भूयां एकत्रित हो कर उनके राज्य राख्या के उद्देश्य से ये गढ़ निर्माण किया। इसी तरह कई पुरखोसे ये बात साला आ रहा हे। इस गढ़ का निर्माण सूर्यबर अथबा कुसुम्बार के राजत्वा के कल में पूरा किया था। भूयां बंश के राजत्व कल पंचदश (१५०० सकाबद्ध) शाटिका। इस गढ़ ने मंगलदाई तथा दर्रांग राज्य में उस समय के भूयां बंश राजाओंने इस राज्य की स्वाधीनता रक्षा के हेतु किया गया संग्राम की परिचय देता हे।
शर्माजी ने और लिखा हे - गढ़ के सामने सरांधारा गाँव के बिभूति मंडल नाम का एक ज्ञानी लोगोने कहा था की, एक समय में दर्रांग राज्य के ४० भूयां एकत्रित हो कर उनके राज्य राख्या के उद्देश्य से ये गढ़ निर्माण किया। इसी तरह कई पुरखोसे ये बात साला आ रहा हे। इस गढ़ का निर्माण सूर्यबर अथबा कुसुम्बार के राजत्वा के कल में पूरा किया था। भूयां बंश के राजत्व कल पंचदश (१५०० सकाबद्ध) शाटिका। इस गढ़ ने मंगलदाई तथा दर्रांग राज्य में उस समय के भूयां बंश राजाओंने इस राज्य की स्वाधीनता रक्षा के हेतु किया गया संग्राम की परिचय देता हे।
वर्त्तमान स्थिति (At present) :
इस गढ़ के अंदर 450 बीघा जमीन हे। गढ़ के अंदर दो तालाब हे (क) सिंगरी पुखुरी (ख) हल्दी खुंडा पुखुरी के नामसे यह के लोगोके बीज जाना जाता हे। यहाँ पर सं 1970-71 में 50 जमीन में नुनी बागीशा नाम का एक फार्म स्थापित किया हे। दक्षिण दिशा में स्थित नुनी बागीशा के तरफ जो गढ़ के एक बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी सुरक्षित अबस्था में हे। इस तरफ काफी जंगल होने के कारन ओहा जा नहीं पाय। पश्चिम दिशा में एक उच्च इंग्रजी विद्यालय, रंगमंच, पंचायत ऑफिस, पोस्ट ऑफिस, मेडिकल सबसेंटरे अदि स्थापित हुआ हे। उत्तर दिशा में एक प्राइमरी स्कूल, कुछ जंगल भी हे। इस के साथ साथ अलग अलग स्थानों में पांच मंदिर हे। और कई घर लोगोका निबाश भी हे। वर्त्तमान भुरारगढ़ के अंदर बीजमेसे एक बड़ा रस्ते का निर्माण का काम हो रहा हे।
अंत में इस भुरारगढ़ के बारे में ये कहाँ जा सकता हे की उस ज़माने के जो लोग थे वो काफी सजक थे। उन लोगोने इस गढ़ का कुछ भी हानि नहीं पहुंसाई।लेकिन धीरे धीरे बढ़ते हुवे शिक्षित लोग और आधुनिक जुगमे लग भाग 90 दशक से इस गढ़ का धंश कार्य सुरु हुवा और वर्त्तमान ये निशिंह होने जारहा हे। 450 बीघा जमीन को घेरा हुवा लग भाग 20-25 फुट उसई का ये बिशाल गढ़ आजसे कुछ साल पहले तक निश्चित रूप से एक देखने लायक इतिहास प्रशिद्ध स्थान थे। वर्त्तमान यहां आके कुछ समय टहरने के बाद ही अनुभव कर सकते हे सारो ओवर फैले हुवे गढ़ का सन्नाटा, संत परिबेश, टूटी-बिखेरती हुई पूर्ब गढ़ का रोने की आवाज। सं 1960 में ही प्रथम प्रकाशित मंगलदाई बुरंजी में ये गढ़ 20 -25 फुट उसाई की रूप में खोद अपने आखोसे देखने की बात उल्लेख किया। वर्त्तमान इसकी उसाई 5-6 फुट होगा। यानी आजसे 100 साल पहले ये गढ़ कितनी बड़ा और ब्यापक था उसे अनुभव किया जा सकता हे। इसके एलोवा सं. 1960 में असम के उस समय के जो गवर्नर थे जोइरामदास दौलतरामजी ने भुरारगढ़ के बारे में काफी अनुसन्धान भी किया था और इतिहासबिद दिनेश्वर शर्माजी के साथ गढ़ की नाम के सम्बन्ध में बतसित भी हुई थी। इसके बाद भी इस ऐतिहासिक गढ़ की सुरक्षा केलिए सरकार की तरफ से कुछ भी व्यबस्था नहीं की। इसके साथ प्रकृति प्रेमी लोग और संगठन समूह भी इसके बारे में कुछ नहीं बोला। किसी ज़माने में हमारा ही पूर्बजोने अपनी भबिश्य नए पीढ़ी की रक्षा करने के लिए काफी मेहनतसे निर्माण कियागया ये गढ़ आज सरोदिशाओ से अपेक्षित हे। भुरारगढ़ के बारे में वर्त्तमान लोगोसे पूछा जाए तो लोग बड़े असानिसे कहता हे की नहीं अब ओहा कुछ नहीं हे। लेकिन ये सच्च नहीं है। ओहा बहुत कुछ हे उन महान लोगो का त्याग, परिश्रम और संग्रामी जीवन का प्रेरणा से भरपूर हे। इसीलिए ये ऐतिहासिक भुरारगढ़ की पूर्ब गरिमा रक्षा हेतु यह पर एक पक्षी उद्यान निर्माण किया जाय। स्थानीय फलों के धेरो पेड़ लगाया जाय पक्षिओ को खाद्य मिलेगा और हमारा बतछो को भी खानेको मिलेगा। नीम की पेड़ लगाने से भी बाताबरण स्वस्थ होगा।
**** उल्लेख किया जाता हे की अपर असम में डिगबोई अरबारेतम (Digboi Arboretum) नाम का बहुत ही सुन्दर फल-मूल का एक बगीसे हे। Arboretum का मतलब Botanical garden की तरह एक मानवसृष्ट जंगल हे। Arboretum में एक Plot में एक ही प्रकार का पेड़ लगाया जाता हे। Digboi Arboretum में लग भाग 50 Hector जमीन हे। सं. 2010 में पेड़ लगाने सुरु कियागया इस बगीसे में सभी प्रकार का स्थानीय फलो का पेड़ लगाया गया हे। साथ में दूसरा मूल्यवान पेड़ भी हे। - इसतरह भुरारगढ़ इलाका के स्थानीय लोग बिशेष रूपसे नए प्रजन्म के लोग आगे आकर भुरारगढ़ के इस बिशाल भूमि में इसतरह की एक Arboretum (बगीसे) निर्माण कर सकता हे।
*** समय जिस गतिसे आगे बढ़ रही हे बहुतही कम समय में ये भुरारगढ़ इलाका भी सहरीकरण होगा ये निश्चित हे। इसीलिए कोई ऑफिस, इंडस्ट्री, फैक्ट्री आदि ना करके प्रकृतिके उपकार केलिए कुछ करना ही उसित होगा। इसीतरह की कदम उठाने से भुरारगढ़ की भोबिस्वा सुरक्षित होगा। और इसतरह सारोतरफ से नोइ रूपसे सजाकर दर्रांग जिल्ला की ये प्राचीन गौरव भुरारगढ़ पूरी दुनिया के आगे समकता हुवा दिखेगा।
**** उल्लेख किया जाता हे की अपर असम में डिगबोई अरबारेतम (Digboi Arboretum) नाम का बहुत ही सुन्दर फल-मूल का एक बगीसे हे। Arboretum का मतलब Botanical garden की तरह एक मानवसृष्ट जंगल हे। Arboretum में एक Plot में एक ही प्रकार का पेड़ लगाया जाता हे। Digboi Arboretum में लग भाग 50 Hector जमीन हे। सं. 2010 में पेड़ लगाने सुरु कियागया इस बगीसे में सभी प्रकार का स्थानीय फलो का पेड़ लगाया गया हे। साथ में दूसरा मूल्यवान पेड़ भी हे। - इसतरह भुरारगढ़ इलाका के स्थानीय लोग बिशेष रूपसे नए प्रजन्म के लोग आगे आकर भुरारगढ़ के इस बिशाल भूमि में इसतरह की एक Arboretum (बगीसे) निर्माण कर सकता हे।
*** समय जिस गतिसे आगे बढ़ रही हे बहुतही कम समय में ये भुरारगढ़ इलाका भी सहरीकरण होगा ये निश्चित हे। इसीलिए कोई ऑफिस, इंडस्ट्री, फैक्ट्री आदि ना करके प्रकृतिके उपकार केलिए कुछ करना ही उसित होगा। इसीतरह की कदम उठाने से भुरारगढ़ की भोबिस्वा सुरक्षित होगा। और इसतरह सारोतरफ से नोइ रूपसे सजाकर दर्रांग जिल्ला की ये प्राचीन गौरव भुरारगढ़ पूरी दुनिया के आगे समकता हुवा दिखेगा।
--- जोय्तु भुरारगढ़ ---
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