Vill+P.O.- Nalkhamara, P.S.- Udalguri, Dist. Udalguri, B.T.A.D. (Assam), Pin- 784509, India
श्रीखितेस्वर डेका (सहायक) श्रीसुसेन डेका (नया पुजारी)
(२) संदेऊ : इस देवालय के एक दूसरा बोसिस्ट हे संदेऊ पूजा। देवालय मूल मंदिर के डाइने तरफ रखा गया पत्थर की मूर्तिको संदेऊ कहा जाता हे।इस संदेऊ पूजा देऊल उत्सव के 5 - 6 दिन के बाद किया जाता हे, इस पूजा में सुवर, मुर्गा, हंस का बलि सराया जाता हे। ये पूजा पूर्ब में देऊल उत्सव के साथ साथ ही किया जाता था। लेकिन इस इस संदेऊ पूजा में बलि सराया जाने के कारण कुछ लोग इसे पसंद नहीं करती। इसीलिए इस संदेऊ पूजा को देऊल उत्सव के 5 - 6 दिन के बाद किया जाता हे। किउकी इस पूजा में बलि देना सायद जरुरी हे।
नलखामरा देवालय
गाँव/डाक- नलखामरा, थाना- उदालगुरी, जिल्ला- उदालगुरी, बी. टी. ए. दी (असम), पिन- ७८४५०९, भारत
परिचय :
अबिभक्त दर्रांग जिला के उदालगुरी सहर से पश्चिम दिशा में नलखामरा नामका एक बहुतही भीतरी इलाके की गाँव में ये नलखामरा देवालय स्थित हे। दूसरी तरफ दर्रांग जिल्लाके मंगलदाई सहर से उत्तर दिशा में कलाईगव नामका एक सहर हो कर इस देवालय तक जाया जा सकता हे। कोच राजा महाराज नरनारायण ने ये प्रतिष्ठा किया था। ये एक बहुतही भीतरी इलाके का गाँव हे। इस गाँव का जनसँख्या बहुतही काम हे। देवालय के आस पास मात्र 33 - 35 घर लोग ही बसा हुवा हे। इस गाँव में राभा और कोच संप्रदाय के लोग हे। राभा और असमिया भासा मिलकर एक नया सुर यहाँ सुना जाता हे। काफी सालोसे एक दूसरे के साथ मिलजुल के रहने के कारन इन संप्रदाय का संम्रिसन होना स्वभाबिक और बहुतही सुन्दर हे। इस इलाके में शिक्षित लोगोका संख्या काफी कम हे। बर्तमान ये प्राचीन देवालय का स्थिति बहुतही नाजुक हे।
श्रीखितेस्वर डेका (सहायक) श्रीसुसेन डेका (नया पुजारी)
पूर्ब परम्परा के अनुसार देवालय में नियुक्त डोलोई परिबार के लोग भी अपनी इस परम्परा को निभाने को असमर्थ हे। वर्त्तमान डोलोई परिबार का कोई भी लोग आगे ना आने के कारन गाँव का एक दूसरा ब्यक्ति ने इस देवालय का पूजा पाठ के साथ साथ इसकी देख भाल की जिम्मा ली हे। इस देवालय का अमूल्य सम्पद हे लकड़ी का बिसेस रूप से बनाया हुवा एक बैठ ने का आसन हे। जिसे सामपिरा कहा जाता हे । ये समपिरा सुन्दर और देखने लायक हे।
ये देवालय का मूल सम्पद सामपिरा
देवालय का मूल उत्सव :
(१) देऊल उत्स्व : बैसाख महीना के 8-9 तारीख को यहाँ पर देऊळ उत्सव को बार्षिक उत्सव की तरपर बरी धूम-धाम से मनाया जाता हे। इस उत्सव में काफी भक्तो का भीड़ होता हे।(२) संदेऊ : इस देवालय के एक दूसरा बोसिस्ट हे संदेऊ पूजा। देवालय मूल मंदिर के डाइने तरफ रखा गया पत्थर की मूर्तिको संदेऊ कहा जाता हे।इस संदेऊ पूजा देऊल उत्सव के 5 - 6 दिन के बाद किया जाता हे, इस पूजा में सुवर, मुर्गा, हंस का बलि सराया जाता हे। ये पूजा पूर्ब में देऊल उत्सव के साथ साथ ही किया जाता था। लेकिन इस इस संदेऊ पूजा में बलि सराया जाने के कारण कुछ लोग इसे पसंद नहीं करती। इसीलिए इस संदेऊ पूजा को देऊल उत्सव के 5 - 6 दिन के बाद किया जाता हे। किउकी इस पूजा में बलि देना सायद जरुरी हे।
संदेऊ
इतिहास :
दर्रांग जिल्ला के इतिहास मंगलदाई बुरंजी में किया गया उल्लेख के अनुसार ये मंदिर एक देवी मंदिर हे। महाराज नरनारायण ने आहम राज्य पर बिजय पाने के लिए आक्रमण करने के समय में ये मंदिर निर्माण किया था। उसी समय में इस मंदिर में पूजा-पाठ देख-भल के लिए महाराज ने बहुतसारा जमीन देबोत्तार को दान दिया था। पूर्ब के पुजारी तथा डोलोई कटीराम कचरी नाम का एक लोग था। इसिके अनुसार इस देवालय का पुजारी कचरी कचरी यानि बरो सम्प्रदाय की रूप में जाना जाता हे। लेकिन ये कचरी सम्प्रदाय के लोग नहीं हे। इसके बाद उनकी पुत्र रतिकांत डेका इस देवालय का डोलोई बनकर परम्परा को साला रहा था। लेकिन डोलोई रतिकांत डेका के मृत्यु के बाद वर्तमान उनके परिबार की कोई भी लोग आगे न आने के कारन श्रीसुसेन डेका नाम का एक व्यक्ति आगे आकर ये जिम्मेदारी खोद ली और वोही वर्तमान देवालय में पूजा-पाठ तथा दूसरे काम-काज संभाल रहा हे। देवालय के नाम पर पूर्ब के अनुसार कुल 48 बीघा जमीन था। अब उनमे से मात्र 16 बीघा जमीं ही हे। ये 16 बीघा म्यादि जमीन वर्तमान नलखामरा ग्रामीण उन्नयन समिति के नाम पर हे। इसी जमीं में खेती करके जो उपार्जन होता हे इसीसे बार्षिक उत्सव आदि उदजापित किया जाता हे।
वर्तमान स्थिति :
** देवालय का मूल सम्पद हे सामपिरा जिसको माँ कामाख्या के रूप में मानकर आरहा हे। ये सामपिरा अति प्राचीन सुन्दर और देखने लायक हे। दुःख की बात हे की ये सामपिरा वर्तमान उपयुक्त परिबेश का आभाव होने के कारन ये ख़राब होने लगा हे। सईद इसमें कीड़े लग रहे हे और काफी अंश खा गया हे। साथ में एक प्राचीन बलि काटने का तलवार भी हे।
** देवालय के पूब दिशा में काफी दुष्पापय (अनमोल) केंटकी फूल के पैर हे ये सब काट दिया गया हे। फिरभी कुछ बचा हुवा हे। फागुन-चोइट महीने में ये केटके फूल फूलता हे और सरोवर दूर दूर तक इसकी खुसबू फ्याल्ता जाता हे।
** देवालय के सामने कुछ प्राचीन पैर हे। जिससे देवालय का भब्यता अनुभव होता हे।
** देवालय के पूब दिशा में काफी दुष्पापय (अनमोल) केंटकी फूल के पैर हे ये सब काट दिया गया हे। फिरभी कुछ बचा हुवा हे। फागुन-चोइट महीने में ये केटके फूल फूलता हे और सरोवर दूर दूर तक इसकी खुसबू फ्याल्ता जाता हे।
** देवालय के सामने कुछ प्राचीन पैर हे। जिससे देवालय का भब्यता अनुभव होता हे।
केटके फूल का पैर इस की खुसबू बहुत तेज़ हे
इसी गारी से देवालय तक
समाप्त :
बहुतही दुःख की बात हे की इतनी प्राचीन इस देवालय के प्रचार और प्रखार की दिशा में बिलकुल दन्धकार में हे। आजकी आधुनिक संबाद माध्यम से भी काफी दूर हे। असम सरकार तथा B.T.A.D. सरकार से भी ये अवहेलित हे। बिसेस रूप से दर्रांग और उदालगुरी दोनों जिला के बीज में भी इस देवालय का प्रचार बहुतही काम हे। इस इलाके की ज्यादातर लोग शायद इस देवालय के बारे में नहीं जानती। कोच राजा के ज़माने का इस प्राचीन देवालय को वर्तमान संरक्षण करने अति आवश्य्क हो गया हे। बिसेष रूप से यहाँ में स्थित प्राचीन सामपिरा जिसको माँ कामाख्या माना जाता हे। ये सामपिरा बहुतही सुन्दर और देखने लायक हे। उपयुक्त परिबेश ना होने के कारन ये सामपिरा नस्ट होने लगा हे। इसी सामपिरा ने नलखामरा देवालय का प्राचीन गरिमा युग युग से बहन करके आरहा हे। अभीतक इस सामपिरा का लग-भाग 40 भाग नस्ट हुवा हे। इसीलिए उपयुक्त संरक्षण तथा साफ-सफाई करके नहीं रखा गया तो ये ज्यादा दिन तक नहीं रहेगा। इसीलिए बोयज्ञानिक पद्धति से इस सामपिरा को संरक्षण करना साहिये। इसके इलवा देवालय के पूब दिशा में स्थित अनमोल केंटकी फूलो की पैर को भी संरक्षण करना सहिये। जिसकी खुसबू सरोवर फेल जाता हे। वर्त्तमान इस केंटकी फूल का खुसबू पाया नहीं जाता और देखा भी नहीं जाता। सन्मुख देवालय के नामके साथ एक (तोरण) गेट होना साहिए। जिस से लोगोको इसे पहचानने में आसानी होगी। दरंग तथा उदालगुरी जिल्ला के ससेतन लोग आगे आकर इस देवालय का प्राचीन इतिहास खोज कर प्रचार करना साहिए। साथ में बिद्यार्थी केलिए इस देवालय के ऊपर रिचार्च करने केलिए काफी कुछ हे। अंत में ये आशा रखता हु की असम सरकार और B.T.A.D. सरकार की तरफ से इस देवालय को संरक्षण करके सुन्दर रूपसे सजाने से हम सभी केलिए गौरव होगा।
-- ॐ नलखामरा देवालय नमः --
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