: LOCATION :
Vill- No.1 Chengapara, P.O. Patherighat, P.S. Sipajhar, Dist. Darrang (Assam), PIN- 784144, India
गाँव- न. १ चेंगापारा, डाक- पथरीघाट, थाना- छिपाझार, जिल्ला- दर्रांग (असम ), पिन- ७८४१४४, भारत
नमस्कार ! आज में दर्रांग जिल्ला तथा असम के एक आध्यात्मिक अनुष्ठान सत्र समूह के बारे में कुछ जानकारी आपलोगोंको देने की प्रयाश करूँगा। पूरी असम के साथ साथ दर्रांग जिल्ला में भी कुछ छते-वोरे, सक्रिय-निष्क्रिय सत्रानुष्ठान बसा हुआ हे। ये सत्र समूह मूल रूपसे वौद्धिक तथा संस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुशीलन का केंद्र हे। ये अनुष्ठान समूह बहुतही प्राचीन लग-भग ४०० साल पहले का हे।
➟➟ आज दर्रांग जिला के एक आध्यात्मिक अनुष्ठान श्रीश्री रत्नावली सत्र के बारे में कुछ बाटे बताने जा रहा हु। ये सत्रानुष्ठान भक्ति रन्तावली नाम का एक बहुतही प्राचीन ग्रन्थ के ऊपर केंद्रित हे।
➟➟ आज दर्रांग जिला के एक आध्यात्मिक अनुष्ठान श्रीश्री रत्नावली सत्र के बारे में कुछ बाटे बताने जा रहा हु। ये सत्रानुष्ठान भक्ति रन्तावली नाम का एक बहुतही प्राचीन ग्रन्थ के ऊपर केंद्रित हे।
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श्रीश्री रत्नावली सत्र का सं 2005 में प्रकाशित अभीतक की लिखित एकमात्र पुस्तक
Introduce :
दर्रांग जिल्ला का मंगलदाई सहर से लग-भग 8-9 k.m दुरी की पश्चिम दिशा में दीपिला नाम का एक इलाका हे। इस दीपिला में 1 नम्बर चेंगापारा नाम का एक गाँव में ये श्रीश्री रत्नावली सत्र नाम के एक प्राचीन धार्मिक अनुष्ठान स्थित हे। ये रत्नावली सत्र दर्रांग प्रशिद्ध श्रीश्री खतरा सत्र के पूर्व दिशा में थोड़ीसी दुरी में स्थित हे।
At Present :
आज से कुछ दिन तक इस सत्र का हालात बहुतही नाजुक था। लेकिन वर्तमान हालही में कुछ सरकारी अनुदान आवंटित हुवा हे, ओर उन्नयन का काम भी चूरू हो गया हे। इसके तहत नया मणिकूट के निर्माण लग-भग सम्पूर्ण होने वाला हे। साथ में Earth filling और Boundary wall का काम भी चूरू हुवा हे।
➟➟ वर्तमान इस सत्र में तीन देउरी यानि पुजारी कर्मरत हे। इन मे से मुख्य पुजुरी श्रीभुवन चंद्र बरुआ और दो सहजोगी के साथ हर दिन पूजा पाठ का काम पूरी लगन से निभा रहा हे। इन मे से मुख्य पुजारी श्रीभुवन चंद्र बरुआ ही मूल मंदिर यानि मणिकूट के अंदर प्रबेश कर सकता हे। बाकि दो पुजारी को मणिकूट के अंदर प्रबेश करने की अनुमति नहीं हे। इसके लिए मुख्य पुजारी को बहुतही कठोर नियमोंके बीज अपने दिन सरिया सालाना पढ़ता हे। मुख्य पुजारी श्रीभुवन चंद्र बरुआ वर्तमान 29 बर्ष से काफी लम्बा समय इस सत्र में अपना योगदान दे रहा हे। इन में से सहजोगी पुजारी श्रीगोपाल बरुआ 8 बर्ष और श्रीगधीर बरुआ पेस्ले 6 बर्ष से यहा अपना योगदान दे रहा हे।
History :
इस सत्र का कोई निर्दिस्ट सं ये तारीख नहीं जाना जाता हे। फिर भी स्थानीय लोगो के अनुसार इस सत्र के बारे में प्रतिष्ठा काल का कुछ बाटे इस तरह बताया जाता हे। ये लग-भग सप्तदश शाटिका का बात हे- पुराणी दर्रांग जिल्ला का उत्तरी अंचल के एक गाँव में पानीरा गठिया नाम का एक व्यक्ति की घर में आग लग जाता हे। इस आग ने उनके सारा संपत्ति पूरी तरह ज्वल गया था। लकिन उनके घर में राख्या गया एक ग्रन्थ तमाम आग से सुरक्षित बस जाता हे। तब स्थानीय लोगो ने मिल कर इस ग्रन्थ को न-नोइ नाम का यहाँ का एक प्रशिद्ध नदी में भासा देता हे।
➟➟ इसी तरह नदी में तैरता हुवा बरियापारा- १नों चेंगापारा गाँव के घाट में रुक गया हे। तब इस गाँव के एक महिला ने स्वपनो में इस ग्रन्थ को पाने में रुका हुवा देखता हे। स्वपनो के अनुसार इस महिला ने घाट में जा कर ग्रन्थ को ले आता हे और अपने ही घर में रख देता हे। इस के बाद मंदिर बना कर वही इस ग्रन्थ को स्थापित करके वो महिला ही सेवक बन कर मंदिर को चलने लगा। इसी तरह उनके मृत्यु के बाद स्वामी श्याम राइ ने सेवक बनकर मंदिर को सलाने लगा।
➟➟ ये मंदिर पहले न-नोइ नाम का नदी के किनारे में ही स्थापित हुवा था। लेकिन नदी के भूमि स्खलन होने के कारन मंदिर को स्थानांतर करना पारा। इसी तरह सं 1955 में वर्तमान का स्थान में इस मंदिर को स्थापन किया गया हे। इसी समय से एक अलग पन्था इस में शामिल होता हे।
➟➟ ये अलग पन्था का नाम पुथीमेशिया भकत के नाम से जाना जाता हे, इस पन्था में नाम-कीर्तन करके मंदिर का काम-काज सालने लगा और धीरे धीरे भक्तो का संख्या भी बढ़ ने लगा। इसी तरह रत्नावली मंदिर सत्र में तबदील हो गया और श्रीश्री रत्नावली सत्र के नाम से जनजात हो गया।
सत्र का मूल सचीपतिया प्राचीन रत्नावली ग्रन्थ के बारे में :
➟➟ ये प्राचीन ग्रन्थ ही सत्र का मूल सम्पद हे। वर्तमान मूल थापना में लकड़ी से बनाया हुवा एक (Box) बिसेष स्थान में सन्मान पुर्बक राख्या गया हे।
➟➟ इस ग्रन्थ का और एक खासियत ये हे की मुठ 13 अध्याय का ये प्राचीन ग्रन्थ हाइटेल छियहि से हाथो से लिख्या गया हे। साथ में बिभिन्न रंगीन चित्र भी अंकित किया हुवा हे हे। इस ग्रन्थ को तेल लगा कर धुप में देने से लिपि और चित्र समूह यदा स्पस्ट तथा साफ देखा जाता हे।
पुजारी, देउरी यानी भकत :
➟➟ यहाँ के सत्र या मंदिर या देवालय समूह में पुजारी को देउरी कहा जाता हे लेकिन इस रत्नावली सत्र में देउरी को भकत कहा जाता हे। भकत वो जो नाम-कीर्तन गा कर मंदिरो में पूजा पाठ का पूरी काम-काज संपादन करता हे। ये भकत कुछ अलग अलग भागो में बता हुवा हे। इन में से पुथिमेचिया नाम का एक भकतो का समूह हे। इसी तरह अलग अलग नाम का भकतो का समूह हे। इन सभी भागो में अलग अलग बिधि से अपना पूजा-पाठ अदि संपन्न करता हे। ये रत्नावली सत्र में जो लोग शामिल हे ये सभी पुथिमेचिया पन्था के अनुसार सलया जाता हे। यहा का देउरी यानि भकत पुथिमेचिया पन्था का होता हे। इस मंदिर का भकत पूर्ब से बॉश के अनुसार साला रहा था। वर्तमान लोगो के द्वारा चुनाव किया जाता हे। भकत यानी देउरी चुनाव होने के बाद वो एक कठोर निति-नियमोंसे अपना जीवन जीना होता हे। मूल देउरी के साथ और एक या दो देउरी सहायक की रूप में नियुक्त किया जाता हे।
रत्नावली सत्र का बिविन्न उत्सव :
वारर्षिक उत्सव (सभा) :
➟➟ जेठ महीने में इस इलाके का सभी लोग मिलकर मंदिर का वार्षिक उत्सव बरी धूम धाम से मनाया जाता हे। इस वार्षिक उत्सव में व्याषर ओजा (Viyasar Oja) और खतरा सत्र से नासने वाला और गाने वाला इस उत्सव में शामिल होना अनिवार्य हे। पेहले ज़माने में मछली और कछुवे का भोग सराया जाता था। वर्तमान इसका व्यबस्था नहीं हे।
दोल :
➟➟ यहा का सभी मंदिर, देवालय के तरह इस रत्नावली सत्र में भी बैसाख महीने की 13 तारीख को दोल उत्सव हर वर्ष मनाया जाता हे।
कार्तिक महीने का कीर्तन पाठ अनुष्ठान :
➟➟ हर साल कार्तिक महीने में इस मंदिर में महीने भर भगवत पाठ किया जाता हे और महीने के अंत में सभी लोग मिलजुल कर नए अनाज से भोजन करके महीने भर का अनुष्ठान समाप्त होता हे।
कच्चा भोग :
➟➟ कच्चा दूध, जहा चावल, गुर, घी, मिठाई आदिके साथ प्रशाद सराणा इस मंदिर का एक नियम हे, इसे कच्चा भोग कहा जाता हे।
पक्का भोग :
➟➟ मंदिर की देउरी ने पूरी नियमो के साथ खीर बना कर साथ में माह-प्रशाद आदिसे भोग सराणा एक अलग नियम हे।
गुरा सेवा :
➟➟ इस मंदिर का एक दूसरा अनुष्ठान हे की - सावल का गुरा, कच्चा दूध, दही और गुर के साथ सराया गया भेद। ये दिन या रात्रि को किया हुवा एक अनुष्ठान हे।
तेल पोरा :
➟➟ ये अनुष्ठान रात्रि को किया जाता हे। रातभर सरसो के तेल का दिया ज्वला कर उसके ही उज्वले में अनुष्ठान की सभी कार्य समाप्त करना होता हे। अनुष्ठान में सभी लोगो को जलपान कराना होता हे। साथ में मंदिर का मूल ग्रन्थ भक्ति रत्नावली को पाठ किया जाता हे। उसके बाद दूसरा ग्रन्थ को भी पाठ किया जाता हे। ये नियम प्राचीन काल से मनाया जा रहा हे। शुवह अनुष्ठान समाप्त होता हे।
भकत सेवा :
➟➟ प्राचीन परम्परा के अनुचर चली आ रही ये अनुष्ठान का नियम ऐसा हे की उत्सव के दिन 9 अलग अलग बस्तु से प्रशाद सराणा। भकत यानि देउरी, सेवक सभी उपवास में रहते हुए शाम के वक्त नाम-कीर्तन करके अन्न पकता हे। इस पकवान में कला माह का दाल, ठेकेरा ठेंगा, पूरा केला, रंगा लाउ, पूठि मछली, दही ये बस्तुए होना अनिवार्य हे। इस पकवान में मचुर दाल, माटी माह अदि का व्यबहार नहीं किया जाता हे। ये पकवान कार्य देउरी के द्वारा सरसों के तेल की दिया ज्वला कर मुँह से बिना कुछ बोले समाप्त करना होता हे। ये पकवान कार्य का शुभारम्भ शंख, घंटे, ताल आदि बजाकर किया जाता हे। इस अनुष्ठान में भक्ति रत्नावली, कीर्तन या घोखा पाठ करना नियम हे। ये अनुष्ठान व्यक्तिगत रूपसे भी कोई चाहे तो कर सकता हे।
सत्र का महत्म :
*** इस सत्र में कुछ महत्म होता हे। इन में से छोटे बच्चो का बुखार अदि होने से मूल देउरी के द्वारा ठीक किया जाता हे। इस तरह बुखार होनेवाला बच्चा यहाँ अपने माँ के साथ होमेसा आता हुवा देखा जाता हे। इसके साथ साथ मानसिक रोगीको को भी यहाँ ठीक किया जाता हे।
समाप्त :
*** इस सत्र को वर्तमान सरकार की तरफ से संरक्षण करना बहुतही जरुरी हे। परन्तु शुभ संबाद ये हे की सत्र के पहले जैसा हालत काफी उन्नत हुवा हे। बिभिन्न सरकारी Scheme से अब आर्थिक अनुदान दिया जा रहा हे। सत्र के सरोवर का परिबेश साथ में गाँव का सुन्दर्य बहुतही सुन्दर हे। मंदिर के पूर्व दिशा में थोड़ी ही दुरी में नो-नोइ नदी का सुन्दर रूप देखने को मिलता हे। आनेवाला दिनों में सत्र के साथ साथ इस गाँव का भी उन्नति होने का पूरी आशा हे। ये प्राचीन सत्र के बारे में प्रचार और प्रखार के दिशा में बहुतही पीछे हे। आनेवाला दिनों में स्थानीय लोगोने इस का प्रचार और प्रखार की दिशा में काम करने से सत्र के साथ साथ इस गाँव के लोगोका भी उन्नति होगा और श्री श्री रत्नावली सत्र पूरी दुनिया के सामने समक उठेगा।
*** अंत में ये आशा करता हु की इस प्राचीन सत्र का प्रचार और प्रखार हो और दर्रांग जिला का इतिहास पूरी विश्व समकता हुवा देखे।
मंदिर और गाँव का कुछ खूबसूरत नज़ारे इसे क्रिपिया देखे-------
- इस सचीपतिया हस्तलिखित ग्रन्थ का मूल प्रणेता विष्णुपुरी सन्यासी।
- पहलीबार असमिया भाषा में भाषांतर किया था महापुरुष माधव देव ने (श्रीमंत शंकरदेव की निर्देश पर)
- ये ग्रन्थ बनारस का कंठभूषण ने श्रीमंत शंकरदेव को दिया था।
- कंठभूषण को ये ग्रन्थ ब्रह्मानंद ने दिया था।
➟➟ ये प्राचीन ग्रन्थ ही सत्र का मूल सम्पद हे। वर्तमान मूल थापना में लकड़ी से बनाया हुवा एक (Box) बिसेष स्थान में सन्मान पुर्बक राख्या गया हे।
➟➟ इस ग्रन्थ का और एक खासियत ये हे की मुठ 13 अध्याय का ये प्राचीन ग्रन्थ हाइटेल छियहि से हाथो से लिख्या गया हे। साथ में बिभिन्न रंगीन चित्र भी अंकित किया हुवा हे हे। इस ग्रन्थ को तेल लगा कर धुप में देने से लिपि और चित्र समूह यदा स्पस्ट तथा साफ देखा जाता हे।
पुजारी, देउरी यानी भकत :
➟➟ यहाँ के सत्र या मंदिर या देवालय समूह में पुजारी को देउरी कहा जाता हे लेकिन इस रत्नावली सत्र में देउरी को भकत कहा जाता हे। भकत वो जो नाम-कीर्तन गा कर मंदिरो में पूजा पाठ का पूरी काम-काज संपादन करता हे। ये भकत कुछ अलग अलग भागो में बता हुवा हे। इन में से पुथिमेचिया नाम का एक भकतो का समूह हे। इसी तरह अलग अलग नाम का भकतो का समूह हे। इन सभी भागो में अलग अलग बिधि से अपना पूजा-पाठ अदि संपन्न करता हे। ये रत्नावली सत्र में जो लोग शामिल हे ये सभी पुथिमेचिया पन्था के अनुसार सलया जाता हे। यहा का देउरी यानि भकत पुथिमेचिया पन्था का होता हे। इस मंदिर का भकत पूर्ब से बॉश के अनुसार साला रहा था। वर्तमान लोगो के द्वारा चुनाव किया जाता हे। भकत यानी देउरी चुनाव होने के बाद वो एक कठोर निति-नियमोंसे अपना जीवन जीना होता हे। मूल देउरी के साथ और एक या दो देउरी सहायक की रूप में नियुक्त किया जाता हे।
रत्नावली सत्र का बिविन्न उत्सव :
वारर्षिक उत्सव (सभा) :
➟➟ जेठ महीने में इस इलाके का सभी लोग मिलकर मंदिर का वार्षिक उत्सव बरी धूम धाम से मनाया जाता हे। इस वार्षिक उत्सव में व्याषर ओजा (Viyasar Oja) और खतरा सत्र से नासने वाला और गाने वाला इस उत्सव में शामिल होना अनिवार्य हे। पेहले ज़माने में मछली और कछुवे का भोग सराया जाता था। वर्तमान इसका व्यबस्था नहीं हे।
दोल :
➟➟ यहा का सभी मंदिर, देवालय के तरह इस रत्नावली सत्र में भी बैसाख महीने की 13 तारीख को दोल उत्सव हर वर्ष मनाया जाता हे।
कार्तिक महीने का कीर्तन पाठ अनुष्ठान :
➟➟ हर साल कार्तिक महीने में इस मंदिर में महीने भर भगवत पाठ किया जाता हे और महीने के अंत में सभी लोग मिलजुल कर नए अनाज से भोजन करके महीने भर का अनुष्ठान समाप्त होता हे।
कच्चा भोग :
➟➟ कच्चा दूध, जहा चावल, गुर, घी, मिठाई आदिके साथ प्रशाद सराणा इस मंदिर का एक नियम हे, इसे कच्चा भोग कहा जाता हे।
पक्का भोग :
➟➟ मंदिर की देउरी ने पूरी नियमो के साथ खीर बना कर साथ में माह-प्रशाद आदिसे भोग सराणा एक अलग नियम हे।
गुरा सेवा :
➟➟ इस मंदिर का एक दूसरा अनुष्ठान हे की - सावल का गुरा, कच्चा दूध, दही और गुर के साथ सराया गया भेद। ये दिन या रात्रि को किया हुवा एक अनुष्ठान हे।
तेल पोरा :
➟➟ ये अनुष्ठान रात्रि को किया जाता हे। रातभर सरसो के तेल का दिया ज्वला कर उसके ही उज्वले में अनुष्ठान की सभी कार्य समाप्त करना होता हे। अनुष्ठान में सभी लोगो को जलपान कराना होता हे। साथ में मंदिर का मूल ग्रन्थ भक्ति रत्नावली को पाठ किया जाता हे। उसके बाद दूसरा ग्रन्थ को भी पाठ किया जाता हे। ये नियम प्राचीन काल से मनाया जा रहा हे। शुवह अनुष्ठान समाप्त होता हे।
भकत सेवा :
➟➟ प्राचीन परम्परा के अनुचर चली आ रही ये अनुष्ठान का नियम ऐसा हे की उत्सव के दिन 9 अलग अलग बस्तु से प्रशाद सराणा। भकत यानि देउरी, सेवक सभी उपवास में रहते हुए शाम के वक्त नाम-कीर्तन करके अन्न पकता हे। इस पकवान में कला माह का दाल, ठेकेरा ठेंगा, पूरा केला, रंगा लाउ, पूठि मछली, दही ये बस्तुए होना अनिवार्य हे। इस पकवान में मचुर दाल, माटी माह अदि का व्यबहार नहीं किया जाता हे। ये पकवान कार्य देउरी के द्वारा सरसों के तेल की दिया ज्वला कर मुँह से बिना कुछ बोले समाप्त करना होता हे। ये पकवान कार्य का शुभारम्भ शंख, घंटे, ताल आदि बजाकर किया जाता हे। इस अनुष्ठान में भक्ति रत्नावली, कीर्तन या घोखा पाठ करना नियम हे। ये अनुष्ठान व्यक्तिगत रूपसे भी कोई चाहे तो कर सकता हे।
सत्र का महत्म :
*** इस सत्र में कुछ महत्म होता हे। इन में से छोटे बच्चो का बुखार अदि होने से मूल देउरी के द्वारा ठीक किया जाता हे। इस तरह बुखार होनेवाला बच्चा यहाँ अपने माँ के साथ होमेसा आता हुवा देखा जाता हे। इसके साथ साथ मानसिक रोगीको को भी यहाँ ठीक किया जाता हे।
समाप्त :
*** इस सत्र को वर्तमान सरकार की तरफ से संरक्षण करना बहुतही जरुरी हे। परन्तु शुभ संबाद ये हे की सत्र के पहले जैसा हालत काफी उन्नत हुवा हे। बिभिन्न सरकारी Scheme से अब आर्थिक अनुदान दिया जा रहा हे। सत्र के सरोवर का परिबेश साथ में गाँव का सुन्दर्य बहुतही सुन्दर हे। मंदिर के पूर्व दिशा में थोड़ी ही दुरी में नो-नोइ नदी का सुन्दर रूप देखने को मिलता हे। आनेवाला दिनों में सत्र के साथ साथ इस गाँव का भी उन्नति होने का पूरी आशा हे। ये प्राचीन सत्र के बारे में प्रचार और प्रखार के दिशा में बहुतही पीछे हे। आनेवाला दिनों में स्थानीय लोगोने इस का प्रचार और प्रखार की दिशा में काम करने से सत्र के साथ साथ इस गाँव के लोगोका भी उन्नति होगा और श्री श्री रत्नावली सत्र पूरी दुनिया के सामने समक उठेगा।
*** अंत में ये आशा करता हु की इस प्राचीन सत्र का प्रचार और प्रखार हो और दर्रांग जिला का इतिहास पूरी विश्व समकता हुवा देखे।
मंदिर और गाँव का कुछ खूबसूरत नज़ारे इसे क्रिपिया देखे-------
मंगलदाई-दीपिला रोड के दक्षिण के तरफ सत्र तक जानेवाला ये रास्ता हे, वोहा SIGN BOARD लगा हुआ हे।
यहाँ का मुख्य देउरी बीज में ओर दोनों तरफ दो सहजोगी
श्रीगोपाल बरुआ (सहजोगी), श्रीभुबन चंद्र बरुआ (मुख्य देउरी ), श्रीगाधीर बरुआ (सहजोगी)
कुछ भक्तो को आशिर्बाद देता हुवा मूल देउरी।
पुराने मणिकूट और नए मणिकूट जो अभी बन रहे हे।
यहाँ मूल देउरी ने बुखार बच्चो को अपने तरीके से इलाज करते हुवे देखा गया हे।
मंदिर के बहार का सुन्दर परिबेश।
मंदिर का तालाब सामने का गेट, दक्षिण दिशा के एक स्थानीय स्कूल अदि।
यहाँ के नो-नोइ नाम का जो नदी हे उसका ये कुछ खूब सूरत नजारा।
जोई तो श्री श्री रत्नावली सत्र नमः
ॐ
ॐ

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